छत्तीसगढ़

श्रम कानून लागू करने में ढिलाई: मजदूरों की हालत पर सवाल- डाक्टर मुंशीराम

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देश में श्रमिकों के हितों के लिए कई कानून बनाए गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। मजदूरी भुगतान अधिनियम 1936 से लेकर न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, बोनस भुगतान अधिनियम 1965 और समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 जैसे कानूनों के बावजूद मजदूर वर्ग को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है।
हाल के वर्षों में विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में हो रहे श्रमिक विरोध प्रदर्शन इस बात का संकेत हैं कि आर्थिक और सामाजिक असमानताएं लगातार बढ़ रही हैं। मजदूरी संहिता 2019 के तहत श्रमिकों को न्यूनतम वेतन, समय पर भुगतान और लैंगिक समानता जैसे अधिकार देने का प्रावधान है, लेकिन वास्तविकता में मजदूरों की आय और खर्च के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। अधिकांश मजदूरों की मासिक आय 10 से 15 हजार रुपए के बीच है, जबकि आवश्यक खर्च 18 से 22 हजार रुपए तक पहुंच जाता है, जिससे उन्हें कर्ज और आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ता है।
बढ़ती महंगाई भी स्थिति को और गंभीर बना रही है। ईंधन, गैस, किराया और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, जबकि मजदूरी में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हो रही। कई स्थानों पर मजदूरों से 10 से 12 घंटे तक काम लिया जाता है, लेकिन न तो उचित वेतन मिलता है और न ही ओवरटाइम का भुगतान। श्रमिकों के पास नियुक्ति पत्र, बीमा और सुरक्षा सुविधाओं का भी अभाव है, जिससे उनका जीवन असुरक्षित बना रहता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुलना करें तो विकसित देशों में कार्य के घंटे तय और नियंत्रित हैं, जहां सप्ताह में औसतन 40 घंटे काम का मानक है। भारत में भी नियम मौजूद हैं, लेकिन समस्या इनके पालन में है। विशेषज्ञों के अनुसार मजदूरों की प्रमुख मांगों में न्यूनतम वेतन, निश्चित कार्य घंटे और सुरक्षित कार्य वातावरण शामिल हैं, लेकिन प्रवासी मज़दूरों की दुर्दशा सुनने वाला कौन है—चाहे वे सीवर लाइनों में मौत हो, औद्योगिक इकाइयों के भीतर बिजली संयंत्रों में होने वाले धमाकों में, या फिर कोयला खदानों में? इन सब से बच भी गए तो ठेकेदारों के शोषण से कौन बचाएगा इन्हे ?। मज़दूरों की समस्याएं नजर अंदाज करने से कभी कभी औद्योगिक विवाद जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं, जिससे औद्योगिक नुकसान और कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित होती है। इससे रोजगार के अवसरों पर भी नकारात्मक असर पड़ता है।
इस संदर्भ में विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार, कंपनियों और मजदूरों—तीनों को मिलकर समाधान निकालना होगा। सरकार को न्यूनतम वेतन और महंगाई नियंत्रण पर ध्यान देना चाहिए, कंपनियों को श्रमिकों को उचित वेतन और सुरक्षित वातावरण देना होगा, वहीं मजदूरों को अपने अधिकारों के लिए संगठित और शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठानी चाहिए। भारतीय श्रम कानूनों के विकास में डॉ. भीमराव अंबेडकर का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 27 नवंबर, 1942 को नई दिल्ली में आयोजित भारतीय श्रम सम्मेलन के 7 वें सत्र में उन्होंने 8 घंटे कार्य दिवस लागू कर श्रमिकों को सम्मानजनक जीवन की दिशा दी थी। आज भी उनके सिद्धांत श्रमिक कल्याण के लिए प्रासंगिक हैं।
श्रमिकों की स्थिति केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानव गरिमा से जुड़ा प्रश्न है। मजदूरी संहिता 2019 सहित श्रम सुधारों का प्रभावी क्रियान्वयन ही इस समस्या का स्थायी समाधान बन सकता है, जिसे राज्यों को तत्काल लागु करना चाहिए तभी ‘विकसित भारत @2047’ की संकल्पना साकार हो पायेगी।

लेखक – डॉ मुंशीराम
एसोसिएट प्रोफेसर, वाणिज्य विभाग
गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर

sushil tiwari

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